श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 21: भीमसेन और द्रौपदीका संवाद  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  4.21.34 
उपालब्धो मया राजा कङ्कश्चापि पुन: पुन:।
ततो न वारितो राज्ञा न तस्याविनय: कृत:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
मैंने राजा विराट और कंक को बार-बार डाँटा, परंतु राजा ने न तो उसे मना किया और न ही उसकी धृष्टता का दमन किया ॥34॥
 
I repeatedly rebuked King Virat and Kanka, but the king neither forbade him nor suppressed his insolence. ॥ 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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