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श्लोक 4.21.22  |
तमहं कुपिता भीम पुन: कोपं नियम्य च।
अब्रुवं कामसम्मूढमात्मानं रक्ष कीचक॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| भीम! उसके ऐसा कहने पर पहले तो मैं क्रोधित हुआ; किन्तु फिर क्रोध पर नियंत्रण करके बोला- 'कीचक! तू काम के वशीभूत हो रहा है। अरे! तू अपनी रक्षा कर।' |
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| Bhima! At first I became angry when he said this; but then I controlled my anger and said- 'Kichak! You are getting attracted by lust. Hey! You protect yourself. |
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