श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 20: द्रौपदीद्वारा भीमसेनसे अपना दु:ख निवेदन करना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  4.20.25 
बिभेमि कुन्त्या या नाहं युष्माकं वा कदाचन।
साद्याग्रतो विराटस्य भीता तिष्ठामि किङ्करी॥ २५॥
 
 
अनुवाद
(फिर वह सिसकते हुए बोली-) 'प्रभु! वही द्रौपदी जो पूर्वकाल में आर्या कुन्ती से अथवा आप लोगों से भी कभी नहीं डरी, आज राजा विराट के सामने दासी बनकर भयभीत खड़ी है।'
 
(Then she said sobbingly -) 'Lord! The same Draupadi who never feared Arya Kunti or even you people in the past, today stands as a maidservant in fear before King Virat.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)