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mahabharat 4.20.23-24h: कुन्तीकुमार! इसके अतिरिक्त मेरी दूसरी असह्य वेदना तो देखो। पहले मैं माता कुन्ती के अतिरिक्त अपने लिए (और किसी के लिए तो क्या, यह भी नहीं) कभी घिसता था; परन्तु आज मैं दूसरों के लिए चन्दन घिसता हूँ। पार्थ! देखो, मेरे ये दोनों हाथ, जिनमें ये खुरदरे हो गए हैं, पहले ऐसे नहीं थे।   |   mahabharat अध्याय 4.20: द्रौपदीद्वारा भीमसेनसे अपना दु:ख निवेदन करना   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 20: द्रौपदीद्वारा भीमसेनसे अपना दु:ख निवेदन करना  »  श्लोक 23-24h
 
 
श्लोक  4.20.23-24h 
इदं तु दु:खं कौन्तेय ममासह्यं निबोध तत्।
या न जातु स्वयं पिंषे गात्रोद्वर्तनमात्मन:।
अन्यत्र कुन्त्या भद्रं ते सा पिनष्म्यद्य चन्दनम्॥ २३॥
पश्य कौन्तेय पाणी मे नैवाभूतां हि यौ पुरा।
 
 
अनुवाद
कुन्तीकुमार! इसके अतिरिक्त मेरी दूसरी असह्य वेदना तो देखो। पहले मैं माता कुन्ती के अतिरिक्त अपने लिए (और किसी के लिए तो क्या, यह भी नहीं) कभी घिसता था; परन्तु आज मैं दूसरों के लिए चन्दन घिसता हूँ। पार्थ! देखो, मेरे ये दोनों हाथ, जिनमें ये खुरदरे हो गए हैं, पहले ऐसे नहीं थे।
 
Kuntikumar! Besides this, look at my other unbearable pain. Earlier, I never used to grind paste for myself (let alone for anyone else) except for mother Kunti; but today I grind sandalwood for others. Parth! Look, these two hands of mine, which have developed calluses, were not like this earlier.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)