श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 20: द्रौपदीद्वारा भीमसेनसे अपना दु:ख निवेदन करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.20.15 
वर्णावकाशमपि मे पश्य पाण्डव यादृशम्।
तादृशो मे न तत्रासीद् दु:खे परमके तदा॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे पाण्डुपुत्र! देखो, मेरे शरीर की कांति कैसी फीकी पड़ गई है! यहाँ नगर में मेरी ऐसी स्थिति तो मेरे अत्यन्त कष्टदायक वनवास के दिनों में भी नहीं थी॥15॥
 
O son of Pandu! See how the radiance of my body has faded! My condition here in the city was not the same even during the days of my most painful exile. ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)