श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 2: भीमसेन और अर्जुनद्वारा विराटनगरमें किये जानेवाले अपने अनुकूल कार्योंका निर्देश  »  श्लोक 25-26h
 
 
श्लोक  4.2.25-26h 
अर्जुन उवाच
प्रतिज्ञां षण्ढकोऽस्मीति करिष्यामि महीपते।
ज्याघातौ हि महान्तौ मे संवर्तुं नृप दुष्करौ॥ २५॥
वलयैश्छादयिष्यामि बाहू किणकृताविमौ।
 
 
अनुवाद
अर्जुन ने कहा - महाराज! मैं राजा के दरबार में दृढ़तापूर्वक घोषणा करूँगा कि मैं शंधक (नपुंसक) हूँ। राजन! यद्यपि धनुष की डोरी की रगड़ से मेरी दाहिनी और बाईं भुजाओं पर जो बड़े-बड़े निशान पड़ गए हैं, उन्हें छिपाना अत्यन्त कठिन है, फिर भी मैं इन प्रहारों से अंकित निशानों को कंगन आदि आभूषणों से ढक दूँगा।
 
Arjun said - Maharaj! I will firmly declare in the court of the king that I am a Shandhaka (impotent). King! Although it is very difficult to hide the big marks that have been made on my right and left arms due to the rubbing of the bow string, yet I will cover these marks marked by the blows with ornaments like bracelets etc. 25 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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