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श्लोक 4.19.47  |
युष्मासु ध्रियमाणेषु दु:खानि विविधान्युत।
शोषयन्ति शरीरं मे किं नु दु:खमत: परम्॥ ४७॥ |
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| अनुवाद |
| तुम सब लोग मेरे जीवित रहते हुए नाना प्रकार के क्लेशों से मेरा शरीर सुखा रहे हो। इससे बड़ा दुःख और क्या हो सकता है? ॥47॥ |
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| You all are drying up my body in various kinds of troubles while I am alive. What can be a greater sorrow than this? ॥ 47॥ |
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इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि द्रौपदीभीमसंवादे एकोनविंशोऽध्याय:॥ १९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदीभीमसेनसंवादविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ श्लोक मिलाकर कुल ५२ श्लोक हैं।) |
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