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श्लोक 4.19.46  |
अत: प्रतिविशिष्टानि दु:खान्यन्यानि भारत।
वर्तन्ते मयि कौन्तेय वक्ष्यामि शृणु तान्यपि॥ ४६॥ |
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| अनुवाद |
| हे भरत! हे कुन्तीपुत्र! मैंने इनसे भी अधिक कष्ट भोगे हैं। मैं उनका भी वर्णन करूँगा। सुनो। |
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| Bharata! O son of Kunti! I have suffered some more troubles than these. I will describe them too. Listen. |
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