श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 19: पाण्डवोंके दु:खसे दु:खित द्रौपदीका भीमसेनके सम्मुख विलाप  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  4.19.45 
किं नु मां मन्यसे पार्थ सुखिनीति परंतप।
एवं दु:खशताविष्टा युधिष्ठिरनिमित्तत:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! हे शत्रुओं का नाश करनेवाले! क्या आप यह सब देखकर मुझे प्रसन्न समझते हैं? राजा युधिष्ठिर के कारण ऐसे सैकड़ों दुःख मुझे सदैव घेरे रहते हैं ॥ 45॥
 
O son of Kunti! O destroyer of enemies! Do you think that I am happy seeing all this? Because of King Yudhishthira, hundreds of such sorrows always surround me. ॥ 45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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