श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 19: पाण्डवोंके दु:खसे दु:खित द्रौपदीका भीमसेनके सम्मुख विलाप  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  4.19.44 
अपश्यमेनं श्रीमन्तं मत्स्यं भ्राजिष्णुमुत्तमम्।
विराटमुपतिष्ठन्तं दर्शयन्तं च वाजिन:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
मैंने अपनी आँखों से सुन्दर, तेजस्वी और तेजस्वी नकुल को देखा है। वे मत्स्यराज विराट को नाना प्रकार के घोड़े दिखाते हैं और उनकी सेवा में खड़े रहते हैं।
 
I have seen with my own eyes the beautiful, radiant and excellent looking Nakula. He shows different kinds of horses to the Matsya King Virat and stands in his service.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)