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श्री महाभारत
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पर्व 4: विराट पर्व
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अध्याय 19: पाण्डवोंके दु:खसे दु:खित द्रौपदीका भीमसेनके सम्मुख विलाप
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श्लोक 33
श्लोक
4.19.33
सहदेवस्य वृत्तानि चिन्तयन्ती पुन: पुन:।
न निद्रामभिगच्छामि भीमसेन कुतो रतिम्॥ ३३॥
अनुवाद
भीमसेन! मैं बार-बार सहदेव की दुर्दशा का चिन्तन करता रहता हूँ, इसलिए मुझे नींद नहीं आती; फिर मुझे सुख कहाँ मिलेगा?॥ 33॥
Bhimasena! I am unable to sleep because I keep thinking about Sahadeva's plight again and again; then where can I find happiness?॥ 33॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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