श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 19: पाण्डवोंके दु:खसे दु:खित द्रौपदीका भीमसेनके सम्मुख विलाप  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  4.19.16 
यस्माद् भयममित्राणां सदैव पुरुषर्षभात्।
स लोकपरिभूतेन वेषेणास्ते धनंजय:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
जो पुरुषों में श्रेष्ठ है और जिससे शत्रु सदैव भयभीत रहते हैं, वही धनंजय आज नपुंसक वेश में लोगों द्वारा निन्दित होकर रह रहा है ॥16॥
 
He who is the best of men and from whom the enemies have always been afraid, that very Dhananjaya is today living in the guise of an impotent, condemned by the people. ॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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