श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 19: पाण्डवोंके दु:खसे दु:खित द्रौपदीका भीमसेनके सम्मुख विलाप  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.19.15 
योऽतर्पयदमेयात्मा खाण्डवे जातवेदसम्।
सोऽन्त:पुरगत: पार्थ कूपेऽग्निरिव संवृत:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! वही वीर अर्जुन जो अपार आत्मविश्वास से युक्त है और जिसने खाण्डव वन में अग्निदेव को संतुष्ट किया था, आज कुएँ में पड़ी हुई अग्नि के समान अन्तःपुर में छिपा हुआ है॥15॥
 
O son of Kunti! The same brave Arjun who is blessed with immense self-confidence and who had satisfied Lord Agni in the Khandava forest, is today hiding in the inner chambers like the fire lying in a well.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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