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mahabharat 4.18.6: हे भरतवंशी रत्न, कुन्तीपुत्र! मैं ऐसे अनेक क्लेशों से निरन्तर पीड़ित रहता हूँ; क्या यह आप नहीं जानते? फिर मेरे जीने का क्या प्रयोजन है?॥6॥   |   mahabharat अध्याय 4.18: द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दु:खके उद्‍गार प्रकट करना   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 18: द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दु:खके उद्‍गार प्रकट करना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  4.18.6 
एवं बहुविधै: क्लेशै: क्लिश्यमानां च भारत।
न मां जानासि कौन्तेय किं फलं जीवितेन मे॥ ६॥
 
 
अनुवाद
हे भरतवंशी रत्न, कुन्तीपुत्र! मैं ऐसे अनेक क्लेशों से निरन्तर पीड़ित रहता हूँ; क्या यह आप नहीं जानते? फिर मेरे जीने का क्या प्रयोजन है?॥6॥
 
O son of Kunti, the jewel of the Bharata clan! I am constantly tormented by many such troubles; don't you know this? Then what is the purpose of my living?॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)