श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 18: द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दु:खके उद्‍गार प्रकट करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  4.18.5 
मत्स्यराजसमक्षं तु तस्य धूर्तस्य पश्यत:।
कीचकेन परामृष्टा का नु जीवति मादृशी॥ ५॥
 
 
अनुवाद
मत्स्य देश के राजा विराट के सामने, उस जुआरी के सामने कीचक ने मुझे लात मारकर जो अपमान किया, उसे मेरे समान कौन राजकुमारी सहन कर सकती है?॥5॥
 
Which princess like me can survive the insult that Keechak did by kicking me in front of Virat, the king of Matsya country, in front of that gambler? ॥5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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