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mahabharat 4.18.4: जब मैं वनवास में गया, तब दुष्टबुद्धि सिन्धुराज जयद्रथ ने मेरा स्पर्श किया, यह दूसरा अपमान था। उसे भी कौन सहन कर सकता है?॥4॥   |   mahabharat अध्याय 4.18: द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दु:खके उद्‍गार प्रकट करना   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 18: द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दु:खके उद्‍गार प्रकट करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  4.18.4 
वनवासगतायाश्च सैन्धवेन दुरात्मना।
परामर्शो द्वितीयो वै सोढुमुत्सहते तु का॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जब मैं वनवास में गया, तब दुष्टबुद्धि सिन्धुराज जयद्रथ ने मेरा स्पर्श किया, यह दूसरा अपमान था। उसे भी कौन सहन कर सकता है?॥4॥
 
When I went into exile, the evil-minded Sindhuraj Jayadratha touched me, this was the second insult. Who can tolerate that too?॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)