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श्लोक 4.18.33  |
एवं बहुविधैर्दु:खै: पीडॺमानामनाथवत्।
शोकसागरमध्यस्थां किं मां भीम न पश्यसि॥ ३३॥ |
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| अनुवाद |
| भीमसेन! मैं अनाथ की भाँति अनेक दुःखों से पीड़ित होकर शोकसागर में डूब रहा हूँ। क्या आप मेरी दुर्दशा नहीं देखते?॥ 33॥ |
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| Bhimasena! Being afflicted with many sorrows like an orphan I am drowning in the ocean of grief. Don't you see my plight?॥ 33॥ |
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इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि द्रौपदीभीमसंवादे अष्टादशोऽध्याय:॥ १८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदीभीमसंवादविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४६ १/२ श्लोक हैं।) |
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