श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 18: द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दु:खके उद्‍गार प्रकट करना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  4.18.30 
सदस्यं यमुपासीनं परस्य प्रियवादिनम्।
दृष्ट्वा युधिष्ठिरं कोपो वर्धते मामसंशयम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
वे एक साधारण सदस्य के रूप में बैठकर दूसरों की सेवा करते हुए विराट के हृदय को प्रसन्न करने वाली बातें कहते हैं। महाराज युधिष्ठिर को इस अवस्था में देखकर मेरा क्रोध अवश्य ही बढ़ जाता है ॥30॥
 
Sitting in the capacity of an ordinary member serving others, he speaks things that please Virata's heart. Seeing Maharaja Yudhishthira in this condition certainly increases my anger. ॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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