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mahabharat 4.18.22: इसके अतिरिक्त ये महाराज स्वयं दस हजार उर्ध्वरेता तपस्वियों का पालन करते थे, जो दान स्वीकार नहीं करते थे। आज वे ही इस राज्य में निवास कर रहे हैं॥ 22॥   |   mahabharat अध्याय 4.18: द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दु:खके उद्‍गार प्रकट करना   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 18: द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दु:खके उद्‍गार प्रकट करना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  4.18.22 
अप्रतिग्राहिणां चैव यतीनामूर्ध्वरेतसाम्।
दश चापि सहस्राणि सोऽयमास्ते नरेश्वर:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
इसके अतिरिक्त ये महाराज स्वयं दस हजार उर्ध्वरेता तपस्वियों का पालन करते थे, जो दान स्वीकार नहीं करते थे। आज वे ही इस राज्य में निवास कर रहे हैं॥ 22॥
 
Besides this, this Maharaja himself used to maintain ten thousand Urdhvareta ascetics who did not accept donations. Today they are the ones who are living in this state.॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)