श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 18: द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दु:खके उद्‍गार प्रकट करना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  4.18.20 
सहस्रमृषयो यस्य नित्यमासन् सभासद:।
तप:श्रुतोपसम्पन्ना: सर्वकामैरुपस्थिता:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
उनके राज दरबार में प्रतिदिन हजारों तपस्वी और वेदों के ज्ञान से संपन्न ऋषि-मुनि बैठते थे।
 
Thousands of accomplished sages and sages endowed with penance and knowledge of the Vedas used to sit in his royal court every day.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)