vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 4: विराट पर्व
»
अध्याय 18: द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दु:खके उद्गार प्रकट करना
»
श्लोक 20
श्लोक
4.18.20
सहस्रमृषयो यस्य नित्यमासन् सभासद:।
तप:श्रुतोपसम्पन्ना: सर्वकामैरुपस्थिता:॥ २०॥
अनुवाद
उनके राज दरबार में प्रतिदिन हजारों तपस्वी और वेदों के ज्ञान से संपन्न ऋषि-मुनि बैठते थे।
Thousands of accomplished sages and sages endowed with penance and knowledge of the Vedas used to sit in his royal court every day.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×