श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 18: द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दु:खके उद्‍गार प्रकट करना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  4.18.19 
एनं हि स्वरसम्पन्ना बहव: सूतमागधा:।
सायम्प्रातरुपातिष्ठन् सुमृष्टमणिकुण्डला:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
इन्द्रप्रस्थ में अनेक सूत और मागध शुद्ध मणियुक्त कुण्डल धारण करके सायंकाल और प्रातःकाल मधुर वाणी से इन महाराज की स्तुति करते थे ॥19॥
 
In Indraprastha, many Sutas and Magadhas wearing pure gem earrings used to praise this Maharaja in the evening and morning with melodious voice. 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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