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श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 18: द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दु:खके उद्‍गार प्रकट करना  »  श्लोक 16-18
 
 
श्लोक  4.18.16-18 
रथा: शतसहस्राणि नृपाणाममितौजसाम्।
उपासन्त महाराजमिन्द्रप्रस्थे युधिष्ठिरम्॥ १६॥
शतं दासीसहस्राणां यस्य नित्यं महानसे।
पात्रीहस्तं दिवारात्रमतिथीन् भोजयन्त्युत॥ १७॥
एष निष्कसहस्राणि प्रदाय ददतां वर:।
द्यूतजेन ह्यनर्थेन महता समुपाश्रित:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जिनके लिए इन्द्रप्रस्थ में सवारी के लिए एक लाख रथ सदैव उपलब्ध रहते थे और जिनकी सेवा में हजारों पराक्रमी राजा बैठते थे, जिनके भोजनकक्ष में एक लाख दासियाँ हाथों में सोने के थाल लेकर दिन-रात अतिथियों को भोजन कराती रहती थीं और जिन्हें दानवीरों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर प्रतिदिन हजारों स्वर्ण मुद्राएँ दान में दिया करते थे, वही धर्मराज यहाँ जुए से अर्जित अत्यन्त पापमय धन पर निवास कर रहे हैं॥ 16-18॥
 
The one for whom one lakh chariots were always available for riding in Indraprastha and in whose service thousands of mighty kings used to sit, in whose dining hall one lakh maids used to serve food to the guests day and night with golden plates in their hands and the one to whom Yudhishthir, the best of donors, used to distribute thousands of gold coins in charity every day, that very Dharmaraj is living here on the very evil money earned through gambling.॥ 16-18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)