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श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 18: द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दु:खके उद्‍गार प्रकट करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  4.18.14 
सोऽयं द्यूतप्रवादेन श्रिय: प्रत्यवरोपित:।
तूष्णीमास्ते यथा मूढ: स्वानि कर्माणि चिन्तयन्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जुए की लत ने उसे राजलक्ष्मी के सिंहासन से नीचे उतार दिया है और अब वह अज्ञानी की तरह चुपचाप बैठकर अपने कर्मों पर विचार कर रहा है।
 
His addiction to gambling has brought him down from the throne of Rajlakshmi and now he sits quietly like an ignorant person, contemplating on his deeds.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)