श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 18: द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दु:खके उद्‍गार प्रकट करना  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  4.18.12-13 
यदि निष्कसहस्रेण यच्चान्यत् सारवद् धनम्।
सायम्प्रातरदेविष्यदपि संवत्सरान् बहून्॥ १२॥
रुक्मं हिरण्यं वासांसि यानं युग्यमजाविकम्।
अश्वाश्वतरसङ्घांश्च न जातु क्षयमावहेत्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
यदि वे प्रतिदिन प्रातः और सायं एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ लगाकर जुआ खेलें तथा सोना, चाँदी, वस्त्र, सवारी, रथ, बकरी, भेड़, घोड़े और खच्चर आदि अन्य बहुमूल्य धन भी अनेक वर्षों तक जुए में हारते रहें, तो भी हमारे राज्य की शोभा कभी कम न होगी ॥12-13॥
 
If they gambled every day morning and evening with a thousand gold coins and gambled away other precious wealth such as gold, silver, clothes, rides, chariots, goats, sheep, horses and mules for many years, even then the glory of our kingdom would never diminish. ॥12-13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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