श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 17: द्रौपदीका भीमसेनके समीप जाना  »  श्लोक 16-18
 
 
श्लोक  4.17.16-18 
स सम्प्रहाय शयनं राजपुत्र्या प्रबोधित:।
उपातिष्ठत मेघाभ: पर्यङ्के सोपसंग्रहे॥ १६॥
अथाब्रवीद् राजपुत्रीं कौरव्यो महिषीं प्रियाम्।
केनास्यर्थेन सम्प्राप्ता त्वरितेव ममान्तिकम्॥ १७॥
न ते प्रकृतिमान् वर्ण: कृशा पाण्डुश्च लक्ष्यसे।
आचक्ष्व परिशेषेण सर्वं विद्यामहं यथा॥ १८॥
 
 
अनुवाद
राजकुमारी द्रौपदी के द्वारा जगाए जाने पर मेघ के समान श्यामवर्ण कुरुपुत्र भीमसेन अपने बिछौने से उठे और अपनी प्रिय रानी से बोले, 'देवी! आप इतनी शीघ्रता से मेरे पास क्यों आई हैं? आपके शरीर की कांति स्वाभाविक नहीं रही। आप पर उदासी छा गई है। आप दुबली-पतली और पीली दिखाई दे रही हैं। मुझे सब वृत्तांत कहिए, जिससे मैं सब कुछ जान सकूँ।॥16-18॥
 
On being awakened by Princess Draupadi, Bhimasena, the son of Kuru, who was dark as a cloud, got up from his bed spread with mats and said to his beloved queen, 'Devi! Why have you come to me in such a hurry? The glow of your body has not remained natural. You are covered with gloom. You look thin and pale. Tell me the whole story, so that I may know everything.॥ 16-18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)