श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 16: कीचकद्वारा द्रौपदीका अपमान  »  श्लोक d98
 
 
श्लोक  4.16.d98 
संधार्य मनसा रोषं दिवारात्रं विनि:श्वसन्।
महानसे तदा कृच्छ्रात् सुष्वाप रजनीं च ताम्॥ )
 
 
अनुवाद
वह अपने मन के क्रोध को दबाए रहता था और दिन-रात गहरी साँसें लेता रहता था। उस दिन वह रसोई में गया और बड़ी मुश्किल से सोया।
 
He used to hold back the anger in his heart and used to take deep breaths day and night. That day he went to the kitchen and slept with great difficulty.
 
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि द्रौपदीपरिभवे षोडशोऽध्याय:॥ १६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदीतिरस्कारसम्बन्धी सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९२ श्लोक मिलाकर कुल १४३ श्लोक हैं।)
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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