श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 16: कीचकद्वारा द्रौपदीका अपमान  »  श्लोक d82
 
 
श्लोक  4.16.d82 
मातृष्वसृसुतां राजन् कीचकस्तामनिन्दिताम्।
सदा परिचरन् प्रीत्या विराटे न्यवसत् सुखी॥
 
 
अनुवाद
राजा! कीचक अपनी बुआ की कन्या, धर्मात्मा एवं पतिव्रता सुदेष्णा की प्रेमपूर्वक सेवा करते हुए विराट के यहाँ सुखपूर्वक रहने लगा।
 
King! Keechak started living happily at Virat's place while lovingly serving his aunt's daughter, the virtuous and faithful Sudeshna.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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