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mahabharat 4.16.d53-d54: जिस कृष्ण के लिए सभी पांडव अपने प्राण त्यागने को तैयार थे, उन्हें उस अवस्था में देखकर भी धर्मात्मा पांडव क्षमा भाव से बैठे थे। जिस प्रकार समुद्र अपने तट की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता, उसी प्रकार वे वनवास के लिए निर्धारित समय का उल्लंघन नहीं कर रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 4.16: कीचकद्वारा द्रौपदीका अपमान   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 16: कीचकद्वारा द्रौपदीका अपमान  »  श्लोक d53-d54
 
 
श्लोक  4.16.d53-d54 
यस्या ह्यर्थे पाण्डवेयास्त्यजेयुरपि जीवितम्।
तां ते दृष्ट्वा तथा कृष्णां क्षमिणो धर्मचारिण:॥
समयं नातिवर्तन्ते वेलामिव महोदधि:॥ )
 
 
अनुवाद
जिस कृष्ण के लिए सभी पांडव अपने प्राण त्यागने को तैयार थे, उन्हें उस अवस्था में देखकर भी धर्मात्मा पांडव क्षमा भाव से बैठे थे। जिस प्रकार समुद्र अपने तट की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता, उसी प्रकार वे वनवास के लिए निर्धारित समय का उल्लंघन नहीं कर रहे थे।
 
Even after seeing Krishna in that condition for whom all the Pandavas were ready to sacrifice their lives, the righteous Pandavas were sitting with forgiveness. Just as the sea does not violate the limits of its shore, similarly they were not violating the time set aside for exile.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)