श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 16: कीचकद्वारा द्रौपदीका अपमान  »  श्लोक d30-d33
 
 
श्लोक  4.16.d30-d33 
विराटराज: सूतं तु सान्त्वेनैव न्यवारयत्।
कीचकं मत्स्यराजेन कृतागसमनिन्दिता॥
नापराधानुरूपेण दण्डेन प्रतिपादितम्।
पाञ्चालराजस्य सुता दृष्ट्वा सुरसुतोपमा॥
धर्मज्ञा व्यवहाराणां कीचकं कृतकिल्बिषम्।
पुन: प्रोवाच राजानं स्मरन्ती धर्ममुत्तमम्॥
सम्प्रेक्ष्य च वरारोहा सर्वांस्तत्र सभासद:।
विराटं चाह पाञ्चाली दु:खेनाविष्टचेतना॥ )
 
 
अनुवाद
उन्होंने शांत भाव से सारथि को ऐसा करने से मना किया। यद्यपि कीचक ने घोर अपराध किया था, तथापि मत्स्यराज ने उसे उसके अपराध के अनुसार दण्ड नहीं दिया। यह देखकर देवकन्या के समान सुन्दरी और मर्यादाओं को जानने वाली पतिव्रता द्रौपदी ने राजा विराट तथा सभा के समस्त सदस्यों की ओर देखकर दुःखी मन से इस प्रकार कहा -
 
He calmly and convincingly forbade the charioteer from doing so. Although Keechak had committed a grave crime, yet the king of the Matsyas did not punish him as per his crime. Seeing this, the virtuous Draupadi, who was as beautiful as a celestial maiden and knew the rules of conduct, looked at King Virat and all the members of the assembly and spoke with a sad heart like this -
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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