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श्लोक  4.16.d23-d24 
क्रियायामक्रियायां च प्रापणे पुण्यपापयो:॥
प्रजायां सृज्यमानायां पुरा ह्येतदुदाहृतम्।
एतद् वो मानुषा: सम्यक् कार्यं द्वन्द्वतया भुवि।
अस्मिन् सुनीते दुर्नीते लभते कर्मजं फलम्॥
 
 
अनुवाद
प्राचीन काल में सृष्टि रचना के समय भगवान ब्रह्मा ने किसी भी कर्म के करने और न करने की स्थिति में पुण्य और पाप की प्राप्ति के विषय में इस प्रकार कहा था- 'हे मनुष्यों! इस पृथ्वी पर द्वैत रूप में प्राप्त धर्म और अधर्म को अच्छी तरह समझकर ही तुम्हें कर्म करना चाहिए; क्योंकि अच्छे या बुरे भाव से किए गए कर्म के अनुसार ही कर्म का फल मिलता है।
 
In ancient times, at the time of creation, Lord Brahma had said thus about the attainment of virtue and sin in case of doing and not doing any action - 'O humans! You should act after understanding well about the Dharma and Adharma received in the form of duality in this earth; Because depending on whether the work is done with good or bad intentions, one gets the results of the karma.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)