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श्लोक 4.16.35  |
परोक्षं नाभिजानामि विग्रहं युवयोरहम्।
अर्थतत्त्वमविज्ञाय किं नु स्यात् कौशलं मम॥ ३५॥ |
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| अनुवाद |
| तब विराट ने कहा - सैरन्ध्री! मैं नहीं जानता कि तुम दोनों में बिना हमारी जानकारी के किस प्रकार झगड़ा हुआ है। और वास्तविक बात को जाने बिना मैं न्याय करने में क्या कुशलता दिखाऊँगा?॥ 35॥ |
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| Then Virat said - Sairandhri! I do not know how the quarrel has taken place between you two without our knowledge. And without knowing the real matter, what skill will I display in doing justice?॥ 35॥ |
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