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श्लोक 4.16.1  |
कीचक उवाच
स्वागतं ते सुकेशान्ते सुव्युष्टा रजनी मम।
स्वामिनी त्वमनुप्राप्ता प्रकुरुष्व मम प्रियम्॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| कीचक बोला- हे सुन्दर जटाओं वाली सैरन्ध्री! तुम्हारा स्वागत है। यह रात्रि और प्रातःकाल मेरे लिए अत्यंत शुभ हैं। अब तुम मेरी स्वामिनी बनकर मेरा प्रिय कार्य करो॥1॥ |
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| Keechak said- O beautiful Sairandhri with beautiful locks! You are welcome. This night and morning are very auspicious for me. Now you become my mistress and do my favourite work.॥ 1॥ |
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