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श्लोक  4.15.d2 
नैषा शक्या हि चान्येन स्प्रष्टुं पापेन चेतसा।
गन्धर्वा: किल पञ्चैनां रक्षन्ति रमयन्ति च॥
 
 
अनुवाद
कोई भी अन्य मनुष्य अपने मन में अशुद्ध विचार रखकर इसे स्पर्श नहीं कर सकता। मैंने सुना है कि पाँच गंधर्व इसकी रक्षा करते हैं और इसे सुख देते हैं।
 
No other man can touch it with impure thoughts in his mind. I have heard that five Gandharvas protect it and give it happiness.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)