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mahabharat 4.15.19-20: वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! द्रौपदी बलहीन होकर दो घड़ी तक भगवान सूर्य की आराधना करती रही। तत्पश्चात, भगवान सूर्य ने द्रुपद की दुबली-पतली कन्या की सम्पूर्ण स्थिति समझ ली और उसकी रक्षा के लिए अदृश्य रूप से एक राक्षस को नियुक्त कर दिया। वह राक्षस उस पतिव्रता द्रौपदी को किसी भी परिस्थिति में असहाय नहीं छोड़ता था।   |   mahabharat अध्याय 4.15: रानी सुदेष्णाका द्रौपदीको कीचकके घर भेजना   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 15: रानी सुदेष्णाका द्रौपदीको कीचकके घर भेजना  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  4.15.19-20 
वैशम्पायन उवाच
उपातिष्ठत सा सूर्यं मुहूर्तमबला तत:।
स तस्यास्तनुमध्याया: सर्वं सूर्योऽवबुद्धवान्॥ १९॥
अन्तर्हितं ततस्तस्या रक्षो रक्षार्थमादिशत्।
तच्चैनां नाजहात् तत्र सर्वावस्थास्वनिन्दिताम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! द्रौपदी बलहीन होकर दो घड़ी तक भगवान सूर्य की आराधना करती रही। तत्पश्चात, भगवान सूर्य ने द्रुपद की दुबली-पतली कन्या की सम्पूर्ण स्थिति समझ ली और उसकी रक्षा के लिए अदृश्य रूप से एक राक्षस को नियुक्त कर दिया। वह राक्षस उस पतिव्रता द्रौपदी को किसी भी परिस्थिति में असहाय नहीं छोड़ता था।
 
Vaishampayana says - Janamejaya! Draupadi, devoid of all strength, kept worshipping Lord Surya for two hours. Thereafter, Lord Surya understood the entire situation of the thin-waisted daughter of Drupada and appointed a demon invisibly to protect her. That demon would never leave the virtuous Draupadi helpless there under any circumstances.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)