श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 15: रानी सुदेष्णाका द्रौपदीको कीचकके घर भेजना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  4.15.1 
वैशम्पायन उवाच
प्रत्याख्यातो राजपुत्र्या सुदेष्णां कीचकोऽब्रवीत्।
अमर्यादेन कामेन घोरेणाभिपरिप्लुत:॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! राजकुमारी द्रौपदी द्वारा इस प्रकार तिरस्कृत किये जाने पर, अत्यन्त भयंकर काम से व्याकुल कीचक ने अपनी बहन सुदेष्णा से कहा -॥1॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! On being spurned in this manner by Princess Draupadi, Kichaka, overcome by immense and dreadful lust, said to his sister Sudeshna -॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)