श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 14: कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना  »  श्लोक d9-d10
 
 
श्लोक  4.14.d9-d10 
दिश: प्रपन्नो गिरिगह्वराणि वा
गुहां प्रविष्टोऽन्तरितोऽपि वा क्षिते:॥
जुह्वन् जपन् वा प्रपतन् गिरेस्तटाद्-
हुताशनादित्यगतिं गतोऽपि वा।
भार्याभिमन्ता पुरुषो महात्मनां
न जातु मुच्येत कथंचनाहत:॥
 
 
अनुवाद
चाहे कोई सभी दिशाओं में शरण ले, पर्वत की बड़ी-बड़ी गुफाओं या दुर्गम कन्दराओं में छिप जाए, पृथ्वी के अन्दर रहने लगे, होम और जप में लगा रहे, पर्वत की चोटी से कूद पड़े, जलती हुई अग्नि या सूर्य की प्रचण्ड किरणों में शरण ले, तो भी जो मनुष्य महान गंधर्व की पत्नी का अपमान करता है, वह किसी भी प्रकार से उनके हाथों से जीवित नहीं बच सकता।
 
Even if one takes refuge in all directions, hides himself in the big caverns or inaccessible caves of the mountain or starts living inside the earth, remains engaged in homa and japa, jumps from the peak of the mountain, takes refuge in the burning fire or the intense rays of the sun, even then a man who insults the wife of a great Gandharva can never escape alive from their hands in any way.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)