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mahabharat 4.14.d2: मनुष्य को पाप नहीं करना चाहिए, अपयश का पात्र नहीं बनना चाहिए, अपनी पत्नी पर स्नेह रखना परम धर्म है। यह मृत व्यक्ति के लिए भी लाभदायक है, इसमें कोई संदेह नहीं है।   |   mahabharat अध्याय 4.14: कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  4.14.d2 
न चाधर्मेण लिप्येत न चाकीर्तिमवाप्नुयात्।
स्वदारेषु रतिर्धर्मो मृतस्यापि न संशय:॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को पाप नहीं करना चाहिए, अपयश का पात्र नहीं बनना चाहिए, अपनी पत्नी पर स्नेह रखना परम धर्म है। यह मृत व्यक्ति के लिए भी लाभदायक है, इसमें कोई संदेह नहीं है।
 
A man should not indulge in sins, should not become a subject of disrepute, it is the ultimate religion to have affection for one's own wife. It is beneficial even for a dead person, there is no doubt about it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)