Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 4.14.50: सूतपुत्र! मुझ पर कुदृष्टि डालकर चाहे पृथ्वी (पाताल) में प्रवेश करो, चाहे आकाश में उड़ जाओ अथवा समुद्र पार भाग जाओ, फिर भी तुम मेरे पतियों के हाथ से नहीं बच सकते; क्योंकि मेरे पति देवताओं के पुत्र हैं और आकाश में विचरण करते हैं। वे अपने शत्रुओं को कुचलने की शक्ति रखते हैं। 50॥ | mahabharat अध्याय 4.14: कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना । mahabharat पर्व 4: विराट पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अन्तर्महीं वा यदि वोर्ध्वमुत्पते:
समुद्रपारं यदि वा प्रधावसि।
तथापि तेषां न विमोक्षमर्हसि
प्रमाथिनो देवसुता हि खेचरा:॥ ५०॥
अनुवाद
सूतपुत्र! मुझ पर कुदृष्टि डालकर चाहे पृथ्वी (पाताल) में प्रवेश करो, चाहे आकाश में उड़ जाओ अथवा समुद्र पार भाग जाओ, फिर भी तुम मेरे पतियों के हाथ से नहीं बच सकते; क्योंकि मेरे पति देवताओं के पुत्र हैं और आकाश में विचरण करते हैं। वे अपने शत्रुओं को कुचलने की शक्ति रखते हैं। 50॥
Sutaputra! Casting an evil eye on me, enter the earth (underworld), fly into the sky or run away across the sea, yet you cannot escape from the hands of my husbands; Because my husband is the son of the gods and wanderers in the sky. They have the power to crush their enemies. 50॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥