श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 14: कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  4.14.5 
तां दृष्ट्वा देवगर्भाभां चरन्तीं देवतामिव।
कीचक: कामयामास कामबाणप्रपीडित:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
द्रौपदी को राजभवन में दिव्य कन्या के समान कान्ति से युक्त घूमती हुई देखकर, काम बाणों से अत्यन्त पीड़ित हुआ कीचक उसकी कामना करने लगा।
 
Seeing Draupadi roaming around in the royal palace like a celestial nymph with the radiance of a celestial maiden, Kichaka, extremely tormented by the arrows of love, started desiring her. 5.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)