श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 14: कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  4.14.49 
अशक्यरूपं पुरुषैरध्वानं गन्तुमिच्छसि।
यथा निश्चेतनो बाल: कूलस्थ: कूलमुत्तरम्।
तर्तुमिच्छति मन्दात्मा तथा त्वं कर्तुमिच्छसि॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
अरे ! तुम उस मार्ग पर जाना चाहते हो जहाँ अन्य मनुष्य नहीं जा सकते। जैसे नदी के एक किनारे पर बैठा हुआ मंदबुद्धि अचेतन बालक तैरकर दूसरे किनारे जाना चाहता है, वैसे ही तुम भी वही विनाशकारी कार्य करना चाहते हो ॥49॥
 
Hey! You want to go on that path where other men cannot go. Just like a slow-witted unconscious child sitting on one bank of a river wants to swim to the other bank, you also want to do the same destructive act. ॥ 49॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)