श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 14: कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  4.14.43 
पृथिव्यां मत्समो नास्ति कश्चिदन्य: पुमानिह।
रूपयौवनसौभाग्यैर्भोगैश्चानुत्तमै: शुभै:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
रूप, यौवन, सौभाग्य और उत्तम शुभ भोगों की दृष्टि से इस पृथ्वी पर कोई दूसरा पुरुष मेरी बराबरी नहीं कर सकता ॥ 43॥
 
In terms of beauty, youth, good fortune and the best of auspicious pleasures there is no other man on this earth who can equal me. ॥ 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)