श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 14: कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  4.14.24 
जज्वाल चाग्निमदनो दावाग्निरिव निर्दय:।
त्वत्सङ्गमाभिसंकल्पविवृद्धो मां दहत्ययम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
निर्दयी कामदेव अग्नि का रूप धारण करके मेरे हृदयरूपी वन में दावानल की भाँति जलने लगे हैं। आपसे मिलने का विचार ही उसमें घी का काम कर रहा है। यह काम मुझे जलाकर भस्म कर रहा है॥ 24॥
 
The merciless Kaamdev has taken the form of fire and has started burning in the forest of my heart like a forest fire. The thought of meeting you acts like ghee in it. This Kaam is burning me by burning me.॥ 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)