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mahabharat 4.14.18-19: आपका सुन्दर मुख अतुलनीय लक्ष्मी से सुशोभित है, आपकी अधखुली पलकें चन्द्रमा की भाँति मन को प्रसन्न करने वाली हैं। दिव्य किरणों से आवृत आपका यह मुख अपनी दिव्य शोभा से मन को मोहित कर लेता है। इसे देखकर संसार में ऐसा कौन मनुष्य है जो काम-वासना से ग्रस्त न हो?॥18-19॥   |   mahabharat अध्याय 4.14: कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 14: कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  4.14.18-19 
अपि चेक्षणपक्ष्माणां स्मितं ज्योत्स्नोपमं शुभम्।
दिव्यांशुरश्मिभिर्वृत्तं दिव्यकान्तिमनोरमम्॥ १८॥
निरीक्ष्य वक्त्रचन्द्रं ते लक्ष्म्यानुपमया युतम्।
कृत्स्ने जगति को नेह कामस्य वशगो भवेत्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
आपका सुन्दर मुख अतुलनीय लक्ष्मी से सुशोभित है, आपकी अधखुली पलकें चन्द्रमा की भाँति मन को प्रसन्न करने वाली हैं। दिव्य किरणों से आवृत आपका यह मुख अपनी दिव्य शोभा से मन को मोहित कर लेता है। इसे देखकर संसार में ऐसा कौन मनुष्य है जो काम-वासना से ग्रस्त न हो?॥18-19॥
 
‘Your beautiful face is adorned with incomparable Lakshmi, the half-open eyelids of your eyes are like moonlight which delights the mind. This face of yours, covered with divine rays, captivates the mind with its divine beauty. Seeing this, who is the man in the whole world who will not fall prey to lust?॥ 18-19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)