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mahabharat 4.14.1-2: वैशम्पायनजी कहते हैं, 'हे जनमेजय! उस समय कुन्ती के वे महाबली योद्धा पुत्र मत्स्यराज नगर में छिपकर रह रहे थे और धीरे-धीरे दस महीने बीत गए। हे राजन! यज्ञसेन की पुत्री द्रौपदी, जो स्वयं स्वामिनी के समान सेवा के योग्य थी, रानी सुदेष्णा का पालन-पोषण करते हुए बड़ी कठिनाई से वहाँ रहती थी।'   |   mahabharat अध्याय 4.14: कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 14: कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  4.14.1-2 
वैशम्पायन उवाच
वसमानेषु पार्थेषु मत्स्यस्य नगरे तदा।
महारथेषु छन्नेषु मासा दश समाययु:॥ १॥
याज्ञसेनी सुदेष्णां तु शुश्रूषन्ती विशाम्पते।
आवसत् परिचारार्हा सुदु:खं जनमेजय॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं, 'हे जनमेजय! उस समय कुन्ती के वे महाबली योद्धा पुत्र मत्स्यराज नगर में छिपकर रह रहे थे और धीरे-धीरे दस महीने बीत गए। हे राजन! यज्ञसेन की पुत्री द्रौपदी, जो स्वयं स्वामिनी के समान सेवा के योग्य थी, रानी सुदेष्णा का पालन-पोषण करते हुए बड़ी कठिनाई से वहाँ रहती थी।'
 
Vaishampayana says, 'O Janamejaya! At that time, those mighty warrior sons of Kunti were living in hiding in the city of Matsyaraja and slowly ten months passed by. O King! Draupadi, the daughter of Yagyasena, who herself was worthy of service like a mistress, lived there with great difficulty, taking care of Queen Sudeshna. 1-2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)