श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 11: अर्जुनका राजा विराटसे मिलना और राजाके द्वारा कन्याओंको नृत्य आदिकी शिक्षा देनेके लिये उनको नियुक्त करना  »  श्लोक d4-d5
 
 
श्लोक  4.11.d4-d5 
विराट उवाच
नार्हस्तु वेषोऽयमनूर्जितस्ते
नापुंस्त्वमर्हो नरदेवसिंह।
तवैष वेशोऽशुभवेषभूषणै-
र्विभूषितो भूतपतेरिव प्रभो॥
विभाति भानोरिव रश्मिमालिनो
घनावरुद्धे गगने घनैरिव।
धनुर्हि मन्ये तव शोभयेद् भुजौ
तथा हि पीनावतिमात्रमायतौ॥ )
 
 
अनुवाद
विराट ने कहा - नरदेवसिंह! यह शक्तिहीन, बलहीन, नपुंसक वेश आपके लिए उपयुक्त नहीं है। आप नपुंसक होने के योग्य नहीं हैं। प्रभु! आपका यह वेश भगवान भूतनाथ के समान अशुभ वेश से सुशोभित है। जिस प्रकार बादलों से आच्छादित आकाश में भी सूर्य का किरणों सहित चक्र शोभायमान होता है, उसी प्रकार आप इस नपुंसक वेश में भी पुरुषत्व से चमक रहे हैं। मेरा विश्वास है कि आपकी मोटी एवं अत्यंत विशाल भुजाओं को केवल धनुष ही सुशोभित कर सकता है।
 
Virat said - Nardevsingh! This disguise of a eunuch devoid of energy and strength is not suitable for you. You are not fit to be a eunuch. Prabhu! This disguise of yours is adorned with inauspicious attire like that of Lord Bhootnath. Just as the circle of the sun with its rays looks beautiful even in the sky covered with clouds, in the same way you are shining with masculinity even in this eunuch disguise. I believe that only a bow can beautify your thick and extremely huge arms.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)