श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 10: सहदेवका राजा विराटके साथ वार्तालाप और गौओंकी देखभालके लिये उनकी नियुक्ति  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  4.10.5-6 
सम्प्राप्य राजानममित्रतापनं
ततोऽब्रवीन्मेघमहौघनि:स्वन:।
वैश्योऽस्मि नाम्नाहमरिष्टनेमि-
र्गोसंख्य आसं कुरुपुङ्गवानाम्॥ ५॥
वस्तुं त्वयीच्छामि विशां वरिष्ठ
तान् राजसिंहान् न हि वेद्मि पार्थान्।
न शक्यते जीवितुमप्यकर्मणा
न च त्वदन्यो मम रोचते नृप:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
शत्रुओं को संताप देने वाले राजा विराट के पास पहुँचकर सहदेव घने मेघों के समान गम्भीर वाणी में बोले - 'महाराज! मैं वैश्य हूँ। मेरा नाम अरिष्टनेमि है। हे राजनश्रेष्ठ! मैं कुरुवंश के रत्न पाण्डवों की गौओं की गणना और देखभाल करता रहा हूँ। अब मैं आपके पास रहना चाहता हूँ; क्योंकि मैं नहीं जानता कि राजाओं में सिंहरूपी पाण्डव कहाँ हैं। बिना कर्म के जीविका नहीं चलती और मुझे आपके अतिरिक्त कोई दूसरा राजा प्रिय नहीं है।'॥5-6॥
 
Reaching near King Virat, who torments his enemies, Sahadeva spoke in a deep voice like the thick clouds of clouds - 'Maharaj! I am a Vaishya. My name is Arishtanemi. O best of kings! I have been counting and taking care of the cows of the Pandavas, the jewels of the Kuru dynasty. Now I want to stay with you; because I do not know where are the lion-like Pandavas among the kings. One cannot earn a living without work and I do not like any other king except you.'॥ 5-6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)