वैशम्पायन उवाच
तथा स राज्ञोऽविदितो विशाम्पते-
रुवास तत्रैव सुखं नरोत्तम:।
न चैनमन्येऽपि विदु: कथंचन
प्रादाच्च तस्मै भरणं यथेप्सितम्॥ १६॥
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - इस प्रकार पुरुषोत्तम सहदेव अपनी प्रजा के रक्षक राजा विराट से अज्ञात रहकर उसी गोशाला में रहने लगे। अन्य लोग उन्हें किसी भी प्रकार से पहचान नहीं सकते थे। राजा ने उनकी इच्छानुसार उनके भरण-पोषण की व्यवस्था की। 16.
Vaishampayana says - In this way, Sahadev, the best of men, remained unknown to the protector of his subjects, King Virat, and started living in the same cowshed. Other people could not recognize him in any way. The king arranged for his sustenance as per his wish. 16.
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि सहदेवप्रवेशे दशमोऽध्याय:॥ १०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें सहदेवप्रवेशविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)