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श्लोक 4.1.d7-28  |
आपदं चापि सम्प्राप्ता द्रौपदी चारुहासिनी।
जटासुरवधं कृत्वा त्वया च परिमोक्षिता॥
मत्स्यराजान्तिके तात वीर्यपूर्णोऽत्यमर्षण:।)
वृकोदर विराटे त्वं रंस्यसे केन हेतुना॥ २८॥ |
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| अनुवाद |
| आपने जटासुर का वध करके मनोहर हास्य से युक्त द्रौपदी को भी संकट के समय से बचाया था। हे भीमसेन! आप अत्यंत बलवान और क्रोधी हैं। मुझे बताइए कि राजा विराट के यहाँ आप कौन-सा कार्य करके सुखपूर्वक रह सकते हैं॥ 28॥ |
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| You had also rescued Draupadi, who was full of charming humour, from a time of trouble by killing Jatasura. O dear Bhimsena, you are very strong and full of anger. Tell me what work you can do in the presence of King Virata to live happily.॥ 28॥ |
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इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि युधिष्ठिरादिमन्त्रणे प्रथमोऽध्याय:॥ १॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें युधिष्ठिर आदिकी परस्परमन्त्रणासे सम्बन्ध रखनेवाला पहला अध्याय पूरा हुआ॥ १॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३४ १/२ श्लोक हैं।) |
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