श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 1: विराटनगरमें अज्ञातवास करनेके लिये पाण्डवोंकी गुप्त मन्त्रणा तथा युधिष्ठिरके द्वारा अपने भावी कार्यक्रमका दिग्दर्शन  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  4.1.d1 
(वैशम्पायन उवाच
एवं निर्दिश्य चात्मानं भीमसेनमुवाच ह॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं, 'हे जनमेजय! इस प्रकार वनवास के दौरान किए जाने वाले कार्यों का वर्णन करके युधिष्ठिर भीमसेन से बोले।
 
Vaishmpayana says, 'O Janamejaya! Having thus described the work to be done by him during his exile, Yudhishthira spoke to Bhimasena.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas