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श्लोक 4.1.d1  |
(वैशम्पायन उवाच
एवं निर्दिश्य चात्मानं भीमसेनमुवाच ह॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं, 'हे जनमेजय! इस प्रकार वनवास के दौरान किए जाने वाले कार्यों का वर्णन करके युधिष्ठिर भीमसेन से बोले। |
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| Vaishmpayana says, 'O Janamejaya! Having thus described the work to be done by him during his exile, Yudhishthira spoke to Bhimasena. |
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