श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 1: विराटनगरमें अज्ञातवास करनेके लिये पाण्डवोंकी गुप्त मन्त्रणा तथा युधिष्ठिरके द्वारा अपने भावी कार्यक्रमका दिग्दर्शन  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  4.1.26 
विराटराजं रमयन् सामात्यं सहबान्धवम्।
न च मां वेत्स्यते कश्चित् तोषयिष्ये च तं नृपम्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
मैं राजा विराट को उनके मंत्रियों और सम्बन्धियों के साथ पासा खेलकर प्रसन्न रखूँगी। इस रूप में मुझे कोई पहचान नहीं सकेगा और मत्स्यराज को भी मैं प्रसन्न रखूँगी॥ 26॥
 
I will keep King Virata happy by playing dice with his ministers and relatives. In this form no one will be able to recognize me and I will keep the Matsya King well satisfied.॥ 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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